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विडंबनाओं के इस देश में सिर्फ विडंबना ही विडंबना है

हम ही समाज के नियमों को बनाते है और हम ही उन्हें बिगाड़ते है। जब कोई नियम दूसरा व्यक्ति तोड़ता है हम खूब हो- हल्ला मचाते है और जब वहीं नियम हम तोड़ते है...